Wednesday, April 29, 2009

काबुली वाला


रवींद्रनाथ टैगोर लिखित कहानी "काबुली वाला" मेरी पसंदीदा कहानियों में से एक है। अपनी बेटी और देश के लिये ऐसे प्रगाढ़ प्रेम का चित्रण सिर्फ टैगोर ही कर सकते थे।

अफगानिस्तान में युद्ध के कारण विस्थापित "रहमत" भारत में आकर जीविका के लिये फल-इत्यादि बेचने लगता है। इसी दौरान उसकी पहचान "मिन्नी" नामक बच्ची से होती है। मिन्नी में रहमत को अपनी बच्ची का स्वरूप दिखायी देता है। लेकिन कुछ समय बाद रहमत के नाम अफगानिस्तान से एक चिट्ठी आती है जिसमें उसकी बेटी की बीमारी की खबर होती है। यह खबर सुनकर रहमत अपने वतन अफगानिस्तान वापस लौटने का निर्णय लेता है। लेकिन मकान-मालिक से किराये की रकम पर झगड़ा होने पर उसका पठानी खून खौल उठता है और रहमत मकान-मालिक को चाकू मार देता है। हत्या के जुर्म के लिये रहमत को आठ साल की जेल हो जाती है। जेल से बाहर निकलने के बाद रहमत मिन्नी से मिलने जाता है, तो पता चलता है कि मिन्नी अब बड़ी हो गयी है और उसकी शादी होने वाली है। रहमत सोच में पड़ जाता है कि अब शायद उसकी बेटी भी शादी के लायक हो गयी होगी। और उसी समय रहमत अपने वतन लौट चलता है।

मन्ना डे के गाये इस गाने में देशप्रेम कूट-कूटकर भरा हुआ है। मानवीय संवेदनाओं का किसी भी गीत में यदि सबसे खूबसूरत चित्रण हुआ है, तो मेरी नजर में इसी गीत में हुआ है। आशा है आपको भी पसंद आया होगा। आजकल की मसाला फिल्में देखने वालों की आँखों में भी यह गीत आँसू ला सकता है।

Tuesday, April 28, 2009

"आपका पूरा नाम क्या है?"

नामों के मामले में भारत में अजब प्रथायें हैं। नाम से न सिर्फ आप यह बता सकते हैं कि व्यक्ति हिंदू है या मुसलमान, आप यह भी बता सकते हैं कि उसकी जाति क्या है। भारत में हर व्यक्ति की जाति होना जरूरी है। एक बार मैंने एक भारतीय को विदेशियों से भी उनकी "जात" पूछते देखा है।


स्कूल के दिनों मेरे एक सहपाठी का नाम "विनोद" लिखवाया गया था। प्रधानाचार्य से लेकर कक्षा के सभी अध्यापकों ने उसे बार-बार अपना कुलनाम जोड़ने के लिये कहा, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। पचास बच्चों की कक्षा के सामने संविधान के सारे कानूनों को दरकिनार करते हुए एक अध्यापक ने उससे पूछा "तुम क्या हो?", तो उसने बताया "मोची"। ताना कसते हुए अध्यापक ने कहा "तुम तभी अपना गोत्र नहीं लिखते हो।"

ये बातें मेरे बाल-मन पर इतनी गहरी छाप छोड़ गयीं कि बीस साल बाद भी मिटा नहीं पाया हूँ। सारा वाकया आज भी जस-का-तस याद है। बच्चों को शिक्षा देकर समाज-निर्माण करने वाले अध्यापक भी ऐसा करेंगे तो किसी और से क्या उम्मीद हो सकती है?

मेरा कुलनाम "कुमार" है। लेकिन भारत में "कुमार" तो किसी भी आदमी के नाम के पीछे लगाया जा सकता है। अत: मेरे कुलनाम को कोई कुलनाम मानता ही नहीं है। कई लोगों ने पूछा भी है, "आपका गोत्र क्या है" - जहाँ तक मुझे मालूम है, मेरा गोत्र "कुमार" ही है। लेकिन मेरे इस उत्तर से आज तक कोई भी संतुष्ट नहीं दिखा है, उनके चेहरे पर साठ नंबर के फॉण्ट का प्रश्नचिन्ह मेरे उत्तर को दरकिनार करता रहा है।

कुछ समय पूर्व सरकारी कागजों में जाति लिखना गैरकानूनी घोषित कर दिया गया था। शायद इसीलिये अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में मेडिकल छात्रों की फाइलों में जाति का कॉलम अब नहीं छापा जाता है। लेकिन ध्यान से देखें तो कुछ छात्रों की फाइल के पहले पन्ने पर लाल स्याही से "S.C." लिखकर कानूनों की धज्जियाँ उड़ा दी जाती है।

सन् २००१ में नयी-नयी डॉक्टरी की उपाधि प्राप्त की थी, तो एक संपादक महोदय से पाला पड़ा। उनके निवेदन पर मैंने कुछ चिकित्सा-संबंधी लेख उन्हें लिखकर दिये। उन्होंने छापे भी, लेकिन मेरा नाम "अनिल कुमार शर्मा" कर दिया। पूछने पर उन्होंने कहा कि "अनिल कुमार" अधूरा-सा लग रहा था, सो उन्होंने पूरा बनाने के लिये "शर्मा" कर दिया। दूसरी बार किसी पत्रिका में नाम छपा, तो मुझे "मिश्रा" कर दिया गया। और अब तीसरी बार छपा है, तो मुझे "यादव" बना दिया गया है। मेरा लेख छापने वाले हर पत्रकार-संपादक ने अपना ही गोत्र मेरे नाम के साथ जोड़ दिया है। शायद मेरा बाप बनने की कोशिश तो नहीं?

अब आगे भी न जाने मेरे नाम को "पूरा" बनाने के लिये क्या-क्या जोड़ा जायेगा, भगवान ही मालिक है।

क्या किसी व्यक्ति की काबिलियत या नीयत का पता लगाने के लिये उसका "गोत्र" या "जाति" का पता लगाना बहुत जरूरी है?

Sunday, April 26, 2009

एक दोहा जिसने मेरी जिंदगी बदल दी

पूरी लगन से काम करने के बावजूद फल न मिलने से कई लोगों को हताश होते देखा है। छात्र जीवन में इसका खासा महत्त्व है। बार-बार कोशिश करने के बावजूद यदि सफलता हाथ न लगे, तो कई छात्र स्कूल ही छोड़ देते हैं। मैं अपने पूरे छात्र जीवन में सिर्फ एक बार असफल रहा हूँ। गणित के विषय में उत्तीर्ण होने के लिये २० में से ७ अंक चाहिये थे, लेकिन मैं ६ ही ला पाया था। एक अंक इसलिये काट लिया गया था क्योंकि मैंने उत्तर को ठीक से रेखांकित नहीं किया था।

मेरा यह मानना है कि परीक्षा ज्ञान को परखने के लिये होती है। मेरा उत्तर सही था, लेकिन फिर भी मुझे असफल घोषित किया गया था। तो मैं अपने गणित के अध्यापक से बात करने जा पहुँचा। जवाब में मुझे मिली पूरी कक्षा के सामने बेंत, थप्पड़ और लातों से आधे घंटे तक पिटाई। दक्षिण दिल्ली के एक प्रतिष्ठित स्कूल की बात कर रहा हूँ, न कि दूर-दराज के किसी गाँव की। खैर मेरी गति शन्नो जैसी न हुई, उस निर्मम पिटाई के बाद भी मैं जिंदा बच गया।

जो कुछ हुआ, उससे मेरा बाल मन बहुत विचलित था। मेरे सामने दो विकल्प थे। या तो "चलता है यार" कहकर भूल जाता, या फिर अपने छोटे से स्वाभिमान को बलशाली करने के लिये और अधिक मेहनत करता। उस संकटपूर्ण समय में मैंने कई दिन सोचने-समझने में लगाये, और इस दोहे को अपना लक्ष्य बनाया:

करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान ।
रसुरी आवत-जात ते सिल पर परत निसान ।।

मैंने हताश होने की बजाय खूब जोर-शोर से पढ़ाई शुरू की, दिन-रात एक कर दिया। पढ़ाई को बोझ या कर्तव्य न समझते हुए उसमें रुचि लेनी शुरू की। जहाँ गणित में मैं असफल हो रहा था, वहीं उसी विषय में सर्वाधिक अंक लाकर कक्षा में प्रथम घोषित किया गया। अगले साल मैं पूरे स्कूल में प्रथम आया। और दसवीं कक्षा में पूरी दक्षिण दिल्ली में प्रथम आया।

जिन अध्यापक महोदय ने मुझे पीटा था, उन्हें मैं आज भी याद करता हूँ। उन्होंने स्कूल के वातावरण में अपने आप को सुरक्षित मानकर एक बच्चे को पीटा था, लेकिन मैंने अपने अथक प्रयासों से उन्हें वाकई गलत ठहराया। दो पंक्ति के उस दोहे ने मेरा जीवन बदल दिया।

मैं ऐसा कर सकता हूँ तो आप भी कर सकते हैं। हमेशा अथक प्रयास करें, कभी पीछे न हटें। अपने आप पर भरोसा रखें, अपने अधिकारों और सत्य के लिये लड़ते रहें। जीत आप ही की होगी।

इसी मौके पर द्वारिका प्रसाद महेश्वरी की इस कविता पर भी मुलाहिजा फरमायें:


वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

हाथ में ध्वजा रहे, बाल दल सजा रहे
ध्वज कभी झुके नहीं, दल कभी रुके नहीं
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

सामने पहाड़ हो, सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर डरो नहीं, तुम निडर डटो वहीं
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

प्रात हो कि रात हो, संग हो न साथ हो
सूर्य से बढ़े चलो, चन्द्र से बढ़े चलो
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

एक ध्वज लिये हुए, एक प्रण किये हुए
मातृ भूमि के लिये, पितृ भूमि के लिये
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

अन्न भूमि में भरा, वारि भूमि में भरा
यत्न कर निकाल लो, रत्न भर निकाल लो
वीर तुम बढ़े चलो ! धीर तुम बढ़े चलो !

Saturday, April 25, 2009

अच्छे टिप्पणीकर्ता कैसे बनें

पहले जब मेरा अंगरेजी चिट्ठा हुआ करता था, तब १० पोस्ट पर कोई एक टिप्पणी आती थी। लेकिन जब से हिंदी चिट्ठा शुरू किया है, १ पोस्ट पर १० टिप्पणियाँ आने लगी हैं। मैं सिर्फ अकेला ही नहीं हूँ, दर्जनों ऐसे ब्लाग हैं जिनपर कुछ भी लिख दिया जाये, टिप्पणियों का अंबार लगते देर नहीं होती। जब इतनी अधिक टिप्पणियाँ हों, तो एक आदर्श टिप्पणीकार संहिता बनाना भी जरूरी हो जाता है न?

आदर्श टिप्पणीकारिता के बारे में मेरे यह विचार हैं:

१) मूल पोस्ट का विषय ध्यान में रखें
यह सबसे पहला नियम है, खेद की बात है यह भी कहना पड़ रहा है। कई चिट्ठों पर विषय से परे टिप्पणियाँ देख चुका हूँ। इनमें से कुछ तो अत्यंत दर्दनाक होती हैं। एक प्रतिष्ठित साहित्यकार के इंतकाल पर यदि टिप्पणी के तौर पर "सुंदर" लिखा जाये तो इसे आप क्या कहेंगे?

२) टिप्पणी की लंबाई ध्यान में रखें
जितने कम शब्दों में आप अपनी बात कह सकते हैं, उतना फायदा है। लिखने वाले को भी सहूलियत होती है, और पढ़ने वाले को भी कम समय में बात पता चल जाती है। हाँ, कभी-कभी टिप्पणी में लंबी बात कहना आवश्यक हो जाता है। उदाहरण के लिये अनिल कान्त जी ने अपनी एक कहानी सुनायी, तो उसके जवाब में मैंने भी अपनी एक कहानी सुना डाली, जिसे आप उस पोस्ट के नीचे पढ़ सकते हैं। वैसे तो मैं इसपर अपनी भी एक पोस्ट ठेल सकता था, लेकिन विषय अनिल कान्त जी की पोस्ट पर उपयुक्त था, तो मैंने वहीं पर एक बहुत लंबी टिप्पणी दे मारी। इससे टिप्पणी पढ़ने वालों को एक नया अनुभव भी हुआ होगा।

३) सभ्य भाषा का प्रयोग करें
खेदजनक है कि पिछले कुछ दिनों में कुछ बहुत ही बेहूदा टिप्पणियों के दर्शन हुये हैं। पढ़े-लिखे लोगों के द्वारा अपमानजनक भाषा का प्रयोग न सिर्फ उनके व्यक्तित्व की झलक देता है, बल्कि हिंदी लेखन का अपमान भी है। यदि किसी से खुंदक निकालनी ही है तो शालीनता से आलोचना कीजिये, लोगों को पढ़ना भी रास आयेगा। और यदि आपकी "भाषा ही ऐसी है" तो फिर लेखक को गोपनीय ईमेल के जरिये संपर्क करें ताकि सार्वजनिक स्थलों पर गंदगी न फैले। आपकी टिप्पणी आपके व्यक्तित्व का आईना है।

४) पोस्ट का लेखक मंझा हुआ है या नया है?
कई बार मुझे किसी मंझे हुये चिट्ठाकार का कोई लेख बहुत पसंद आता है लेकिन पहले से ही लोगों की वाहवाही की टिप्पणियों का ढेर लगा होता है। तो मैं उस लेख को अपने दोस्तों को ईमेल के जरिये भेजकर उसका प्रचार कर देता हूँ, लेकिन टिप्पणी नहीं करता क्योंकि मेरे "बहुत सुंदर" टिपियाने से कुछ नयी सूचना नहीं जुड़ेगी। हाँ, नये लेखकों को प्रोत्साहित करने के लिये मैं अपनी टिप्पणी जोड़ने से बाज नहीं आता। जब मैं नया था तो मेरा भी इसी तरह प्रोत्साहन किया गया था, तो मेरा भी फर्ज बनता है कि नये चिट्ठाकारों की हौसलाअफजाई करूँ।

५) असहमति से पहले सहमति
यदि कोई पोस्ट आपको बहुत बुरी लग रही है और आपने उसको नेस्तनाबूद करने वाली टिप्पणी छोड़ने का इरादा कर लिया है, तो एक क्षण रुकिये। उस पोस्ट को दोबारा पढ़कर यह देखिये कि आपको "सहमति" किन बिंदुओं से है। टिप्पणी की शुरुआत यदि आप सहमत बिंदुओं से करेंगे तो एक "विकासशील" टिप्पणीकर्ता कहलायेंगे, नहीं तो निर्मम आलोचक ही बनकर रह जायेंगे।

६) स्वप्रचार की हदें
कई बार लोग अपनी हर टिप्पणी में अपना एक लिंक देकर आपको उसपर चटका लगाने के लिये अनुरोध करते हैं। यदि लिंक पोस्ट के मूल विषय से संबंधित है, और पाठकों को अतिरिक्त जानकारी प्रदान करता है, तो ठीक है। कुछ लोग टिप्पणी के अंत में अपने चिट्ठों के लिंक "हस्ताक्षर" की तरह भी उपयोग करते हैं, मुझे इसमें भी कुछ बुराई नहीं दिखायी देती। लेकिन एक ही टिप्पणी हर जगह देकर लोगों से अपने चिट्ठे पर चटकाने की याचना करना थोड़ी बचकानी हरकत लगती है। अत्यधिक स्वप्रचार से बचें।

७) विवादित विषयों से बचें
कुछ विषय ऐसे होते हैं जिन्हें भुनाया जा सकता है, लेकिन इनपर विवाद भी खड़े होते हैं। मैं ऐसे कुछ विवादित विषयों से बचने की हरसंभव कोशिश करता हूँ। उदाहरण के लिये मैंने परमाणु संधि विषय पर बहुत टिप्पणियाँ नहीं की क्योंकि वह एक बहुत विवादित विषय था। उसी तरह से वरुण गाँधी पर भी मैं टिपियाने से बचा क्योंकि वहाँ भी विवाद का कटघरा हाजिर था। यदि मैं इन विषयों पर टिप्पणी करता तो मेरी भी टांग खींची जाती।

८) टिप्पणी की सदस्यता जरूर लें
आपने टिप्पणी कर तो दी। लेकिन उस टिप्पणी पर भी कुछ लोग बाद में उसी पोस्ट पर टिप्पणियाँ करते हैं। उनसे अवगत रहने के लिये टिप्पणी की ईमेल सदस्यता जरूर लें, ताकि पता चलता रहे की आपकी टिप्पणी पर क्या प्रतिक्रिया हुई।

९) टिप्पणी कर्मभाव से करें, फलभाव से नहीं
इस लेख के लिखे जाने के बाद यह संपादन किया गया है। श्री रजनीश परिहार जी कहते हैं कि "यदि आपको पोस्ट अच्छी लगे तो ही.. टिप्पणी करे ...बदले में मुझे भी टिप्पणी मिलेगी ,की भावना ना रखे ,यही ठीक है.."। मैं उनसे शत-प्रतिशत सहमत हूँ। यही गीता का सार भी कहता है!

१०) अपने गिरेबान में जरूर झाँककर देखिये
हमेशा यह जरूर देखिये कि यदि वही टिप्पणी कोई आपके चिट्ठे पर छोड़ेगा तो आपको कैसा लगेगा?

नीचे टिप्पणी करने का लिंक दिया हुआ है, अभी से "प्रैक्टिस" शुरू कर सकते हैं!

Friday, April 24, 2009

प्रेम की आहुति

नौ साल पहले मोबाइल पर किसी का SMS आया था। एक नये दौर की कविता थी, इतनी महत्त्वपूर्ण लगी कि आज तक सहेज कर रखी हुयी है। मुलाहिजा फरमायें:

कृष्णा और हम

कृष्णा करे तो रासलीला ,
हम करे तो कैरेक्टर ढीला!
कृष्णा में दीखते विष्णु और ब्रह्मा ,
हम में जग का सबसे निकम्मा!

कृष्णा गोपियों के वस्त्र चुराते ,
हम तो केवल दूर से ताकते ,
फिर भी कृष्णा के भजन तुम गाते ,
और हमको ताने आते -जाते!

कृष्णा की हजारों गोपियाँ ,
हम तो चाहे एक ही सीता!
फिर भी कृष्णा की पढ़ते तुम गीता ,
और हमको कहते तो नासपीटा!

कृष्णा ने राधा से की बेवफाई ,
फिर भी कहा न उनको हरजाई!
हमने कभी न छोड़ा तुम्हारा दुपट्टा ,
फिर भी कहती हो उल्लू का पठ्ठा!

पहले तो पढ़कर बहुत हँसी आयी, लेकिन दो मिनट बाद बोध हुआ कि यह एक हलका-फुलका SMS नहीं, आजकल की भारतीय संस्कृति का यथार्थ है।

एक दोस्त की कहानी बताता हूँ जिसे मैं पच्चीस साल से जानता हूँ - हम बचपन के दोस्त हैं। दो साल पहले वह अचानक गायब हो गया, मैंने उसे हजारों फोन किये, ईमेल किया, लेकिन कोई जवाब नहीं आया। आज उसका फोन अचानक मिल गया। वही हुआ जिसका मुझे डर था।

मेरे दोस्त को एक लड़की से प्यार हो गया था। वे एक दूसरे को पाँच साल से जानते थे। लेकिन दोनों के घरवालों की नजर में प्रेम करना बुरी चीज है। लोग क्या कहेंगे, "जी आपका बेटा इश्क लड़ा रहा है, आपकी बेटी फलाने के साथ गुलछर्रे उड़ा रही है।" दोनों का धर्म, जाति, आर्थिक स्थिति बिलकुल मेलजोल की थी, लेकिन फिर भी समाज के डर से दोनों की शादी नहीं होने दी गयी। अब मेरा दोस्त जिंदगी की जद्दोजहद में बहकर अपने टूटे हुये दिल के दर्द को घोलने की कोशिश कर रहा है। और नारी सशक्तीकरण के इस दौर में भी वह लड़की अपनी घुटन पर जीत अर्जित करने में असक्षम है।

आज से ठीक दो महीने बाद उसी लड़की की किसी और से शादी होने जा रही है। मेरे दोस्त का घर उस लड़की के घर के पास ही है। इसलिये "शिष्टता" के नाते मेरे दोस्त को अपनी ही प्रेमिका की शादी का न्यौता आया है! यदा-कदा ऐसी घटनायें फिल्मों में देखता था, आज मेरे सबसे प्यारे दोस्त के साथ ही घट गयी!

हम रोज़मर्रा की जिंदगी में बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। कभी लोकतंत्र तो कभी भ्रष्टाचार - हर मामले पर हमारी "प्रबुद्ध" राय तैयार रहती है। लेकिन खुद अपने जीवन में हम ईमानदारी और प्रबुद्धता उतारने को राजी नहीं। हम सबको कहते हैं कि "आपका वोट महत्त्वपूर्ण है, सोच-समझकर फैसला लें"। लेकिन फिर उसी मतदाता को अपने ही जीवन के महत्त्वपूर्ण फैसले लेने से रोक देते हैं। जो अपने निजी जीवन के फैसले अपनी पसंद के मुताबिक नहीं ले पा रहा, उससे राष्ट्रनिर्माण के फैसले कैसे लिवायेंगे?

फिल्मों में नायक-नायिका के प्रेम की वाहवाही करने वाले अपने ही घर की प्रेम कथाओं का गला क्यों घोंटते हैं? मंदिरों में राधा-कृष्ण के प्रेम की पूजा करने वाले अपने ही घर में पल रहे प्रेम को क्यों दुत्कारते हैं? राधा-कृष्ण को पूजने वाले देश में प्रेमियों को सरेआम फाँसी क्यों दी जाती है?

मेरे दोस्त ने बचपन से अभी तक बहुत से अच्छे काम किये हैं। अपने मोहल्ले में पानी का नल भी उसी ने लगवाया था, कई गरीब बच्चों को मुफ्त में ट्यूशन देकर नौकरी पाने लायक बनाया था, मंदिरों में श्रमदान किया था। समाज ने उसकी कभी तारीफ नहीं की। लेकिन आज जब वह अपनी जिंदगी का एक फैसला खुद लेना चाहता है, तो वही समाज उसके रास्ते में रोड़ा बनकर खड़ा हो गया है।

हमें चाहिये कि युवाओं के फैसलों का आदर करना सीखें, चाहे वह उनके व्यक्तिगत मामले हों या फिर देश को बनाने की बातें। युवाओं की अपार ऊर्जा को ठीक गति दी जायेगी तभी देश का कुछ हो पायेगा, नहीं तो विरोधाभास चल ही रहा है, आगे भी विरोधाभास ही चलता रहेगा।

याद रखें, हर लड़के में कृष्ण हो सकता है, और हर लड़की में राधा।

(यदि पढ़ने का और मन है तो यहाँ भी निगाह डाल सकते हैं।)

Thursday, April 23, 2009

चोरी किया गया पासवर्ड वापस कैसे लायें

कल मैंने अपने पासवर्ड को सुरक्षित रखने के कुछ नुस्खे बताये थे। यदि फिर भी पासवर्ड चोरी हो जाये तो क्या करें?

जिसने पासवर्ड ईजाद किये थे उसे मालूम था कि इनकी चोरी भी की जा सकती है। इसलिये पासवर्ड वापस लाने के लिये कई तरह की जुगत होती हैं। जीमेल/गूगल के पासवर्ड चोरी होने की स्थिति में उन्हें वापस लाने की प्रक्रिया बता रहा हूँ।

भाग १: पासवर्ड खोने से पहले
अपने सुरक्षा प्रश्नों के उत्तर निर्धारित करें। ऐसा करने के लिये तुरंत इस लिंक पर चटका लगायें:


फिर उस पन्ने पर ऐसा कुछ उभरेगा:

 पहली पंक्ति में अपना वर्तमान जीमेल पासवर्ड डालें।
दूसरी पंक्ति में एक सुरक्षा प्रश्न चुनें। यदि पसंद का कोई प्रश्न न हो तो आखिरी विकल्प (choose your own question) चुन लें। फिर अपनी पसंद का कोई भी प्रश्न लिख डालें।
तीसरी पंक्ति में उपरोक्त प्रश्न का ऐसा जवाब लिखें जो आपको याद रहेगा।
चौथी पंक्ति में अपना कोई दूसरा, चालू ईमेल खाता दे दें ताकि पासवर्ड खोने की स्थिति में गूगल बाबा आपका खोया हुआ पासवर्ड उस पते पर भेज सके। यह पता आपका ही होना चाहिये, नहीं तो पासवर्ड किसी और तक पहुँच जायेगा!


तो यह हुयी आज की तैयारी। जब कभी पासवर्ड खो जाये, तो क्या करें?

भाग २: पासवर्ड खोने के बाद: 

क) यदि आप पासवर्ड भूल गये हैं तो यहाँ पर चटका लगायें। फिर गूगल आपका user name पूछेगा, उसके बाद वर्ड वेरिफिकेशन होगा। उसके बाद आपका पासवर्ड पुनर्निर्धारित करने का लिंक आपके उस ईमेल पर भेज दिया जायेगा जो आपने ऊपर भाग १ में दिया था। यदि आपसे वह दूसरा ईमेल किसी कारणवश नहीं खुल रहा तो २४ घंटे बाद दोबारा यही प्रक्रिया दोहरायें। तब आप भाग १ में निर्धारित किये हुये सुरक्षा प्रश्नों के उत्तर देकर अपना पासवर्ड तुरंत ही पुनर्रनिर्धारित कर सकेंगे। यदि आप अपने सुरक्षा प्रश्न भी भूल चुके हैं तो आपके पास आखिरी हथियार है यह लिंक। यहाँ पर दिये गये फॉर्म को भरकर आप गूगल बाबा के उत्तर की प्रतीक्षा करें। यदि सौभाग्य रहा तो गूगल बाबा आपके खाते का पासवर्ड आपको वापस कर देंगे।

ख) यदि आपका पासवर्ड किसी ने चोरी कर लिया है तो सीधे ही "पासवर्ड रिकवरी पेज" पर जाकर फार्म भर दें। गूगल बाबा आपसे संपर्क करेंगे और आपका पासवर्ड आपको फिर से सुपुर्द कर देंगे।

याहू पर भी कुछ इसी तरह की सुविधा उपलब्ध है। खोया/चुराया हुआ याहू पासवर्ड वापस लाने के लिये इस लिंक से प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। कृपया अभी अपने याहू खाते में जाकर अपनी सुरक्षा सेटिंग देख लें, ताकि बाद में पासवर्ड वापस लाने में वह काम आयें।

कृपया इस पन्ने को अभी बुकमार्क करें, ताकि आड़े वक्त काम आये।

Wednesday, April 22, 2009

पासवर्ड की चोरी की रोकथाम


कल मुसाफिर जाट जी का पासवर्ड हैक हो गया। पूरी कहानी बहुत भयावह है। यह किसी के साथ भी हो सकता है। आपके साथ भी, मेरे साथ भी। सोचिये यदि आपके ब्लाग का पासवर्ड कोई हैक कर ले और ऊल-जुलूल पोस्ट और टिप्पणियाँ आपके नाम से डालने लगे तो जूते खाने तक की नौबत आ सकती है। इसलिये जनहित में पासवर्ड चोरी होने से बचने के नुस्खे बता रहा हूँ, आशा है आप सबके काम आयेंगे।

1) अपना पासवर्ड भूल कर भी किसी को न दें: कुछ दिन पहले एक सज्जन का ब्लाग बिगड़ गया, और उन्हें सुधारना नहीं आया। वे मेरे ब्लाग के नियमित पाठक हैं। तो उन्होंने बिना कुछ सोचे-समझे सीधे मुझे अपने ब्लाग का पासवर्ड भेज डाला, और साथ में निवेदन "कृपया समय मिले तो मेरी परेशानी ठीक करें"। मानता हूँ कि मेरा ब्लाग पढ़ने के बाद उनको मुझपर भरोसा था, लेकिन ऐसे ही किसी को अपना पासवर्ड भेज देना बुद्धिमानी नहीं। मजाक में कह रहा हूँ, यदि भगवान भी आकर मुझसे मेरा पासवर्ड मांगेगा तो नहीं दूंगा। लेकिन मजाक की भी एक गंभीरता होती है, उसे समझें।

2) पासवर्ड कहीं लिखकर हरगिज न रखें: एक बार मैंने दिल्ली में एक दुकान से चने-मुरमुरे खरीदे। दुकानदार ने कागज के लिफाफे में दिये - ऐसे लिफाफे अकसर पुरानी कापी-किताबों के पन्नों से बने होते हैं। लिफाफे पर एक जनाब का ईमेल पता और पासवर्ड लिखा हुआ था। मैंने उन्हें तुरंत ईमेल करके उन्हें इससे अवगत कराया। वे चेन्नई में रहते थे। लेकिन उनकी कापी वहाँ से दिल्ली तक आकर लिफाफे में कैसे तब्दील हुयी, इसपर हम दोनों हैरत में थे। अपना ईमेल और पासवर्ड दोनों एक साथ कभी भी न लिखें।

3) पासवर्ड ऐसा रखें कि कोई अनुमान न लगा सके: पासवर्ड खाते के नाम से अलग होना चाहिये, आपके नाम से भिन्न होना चाहिये, उसमें अपनी जन्मतिथि, पिताजी या माताजी का नाम, फोन नंबर इत्यादि कभी न डालें। ये सभी सूचनायें आपके करीबी लोग जानते हैं, और कभी भी आपका पासवर्ड हैक कर सकते हैं।

4) जिसका पासवर्ड हो, उसी साइट पर प्रयोग करें: एक बार किसी ने ईमेल पर एक मजेदार विडियो भेजा। विडियो के पन्ने पर लिखा था कि इस विडियो को अपने सभी दोस्तों को भेजने के लिये अपना ईमेल और पासवर्ड डालें। अरे नहीं भाई, ऐसा कभी न करें! यदि कर दिया तो उस साइट को आपका पासवर्ड मिल जायेगा, और फिर वे उसका कुछ भी कर सकते हैं। यहाँ तक कि वे आपका पासवर्ड बदलकर आपको अपने ही ईमेल से बेदखल कर देंगे! तो भई गूगल का पासवर्ड गूगल की ही साइटों पर डालें (गूगल की सभी साइटों की सूची यहाँ है)।

5) पासवर्ड चुनने में अक्षर और अंक दोनों का प्रयोग करें: इससे हैक करने वालों को काफी दिक्कतें होती हैं और वे हताश होकर आपके पासवर्ड की हैकिंग रोक भी सकते हैं।

6) किसी अनजान कंप्यूटर पर लॉगिन करने से बचें: कई लोग अपने कंप्यूटर पर पासवर्ड चोरी करने वाले प्रोग्राम डालकर रखते हैं, ताकि कोई और उनका कंप्यूटर इस्तेमाल करे तो उनका पासवर्ड उन्हें मिल जाये। छात्रावासों में तो यह आम बात है! इंटरनेट कैफे में भी आपको क्या पता कि कंप्यूटर पर क्या-क्या प्रोग्राम डाले गये हैं? जहाँ तक संभव हो, एक ही कंप्यूटर पर काम करें जिससे कोई और छेड़छाड़ न कर पाये। यदि किसी और के कंप्यूटर पर काम करना भी पड़े तो वापस अपना कंप्यूटर मिलते ही तुरंत पासवर्ड बदल दें।

7) अपना पासवर्ड हर साल बदलते रहें: जब भी आप अंतरजाल पर कहीं पासवर्ड डालते हैं, तो न जाने कितने ही देशों से गुजरता हुआ आपका पासवर्ड गंतव्य स्थल पर पहुँचता है। कहीं भी शैतानी करने वाले लोग मिल सकते हैं जो आपके पासवर्ड को "कैच" करने के लिये जाल बिछाकर बैठे रहते हैं। अपने पासवर्ड के कदमों के निशान मिटाने के लिये अपना पासवर्ड बदलते रहें। मैं हर साल अपने जन्मदिन पर अपने सभी पासवर्ड बदल देता हूँ।
8) विंडोज़ छोड़कर लिनक्स की ओर जायें: माइक्रोसॉफ्ट का विंडोज़ (XP, Vista) इस्तेमाल करने वालों को हैकिंग के बहुत खतरे रहते हैं। इसकी तुलना में लिनक्स और मैक सिस्टम में हैकिंग का नगण्य खतरा है। अतः आज ही लिनक्स को इस्तेमाल करने के बारे में सोचें। लिनक्स में सभी भारतीय भाषाओं को इस्तेमाल करने की पहले से ही व्यवस्था है। शुरुआत उबुंतू नामक लिनक्स से हो सकती है।

जैसे आप अपने घर की हिफाजत ताला लगाकर करते हैं, वैसे ही अपनी अंतरजालीय जिंदगी पर भी पासवर्ड-रूपी ताले की देखभाल करें।

इतना सब करने के बाद यदि पासवर्ड चोरी हो ही गया तो? ... यह अगली किस्त में!